Yaadein..

Seene me tumhari jo yaadein sulagti hain..
Har saans k saath unpe hawa lagti hai..
Ab saans b na le hm
Matlab khatm ho jaein
Kitni ranjishon k beech ye mohabbat palti hai.

Tujhse na sahi..Tere khyalon se khoob banti hai
Har lafj me bas teri hi parasti hai
Ab kuch na hi bole hm
Matlab khamosh ho jaein
Meri hi khilafat me mera dil, mano teri hi basti hai.

Wo khwab, teri baatein, ankho me rehti hain
Band kro toh chubh jaein kholo to behti hain
Ab aankh bhi na khole hm
Matlab so jaein
Yhan hr ghadi dushwar h..aur log kehte hain raat choti hoti hai.

Jab se hmne bola tumhe ab yad nhi karna
Tab se har dhadkan hmari hm pe hi hansti hai.

Seene me tumhari jo yaadein sulagti hain..
Har saans k saath unpe hawa lagti hai..

Advertisements

डर लगता है..।।

कोई और ख़्वाब न देख लूं

कि..सोने से डर लगता है..

जो करना है..जिन्दा रहते करना है..

मरने के बाद तो हर किसी का सितारा चमकता है।

कही ये ख़्वाब बह न जाएं..

कि..रोने से डर लगता है।।

उसे अपना बनाया तो तोड़ के चला गया

ये अपना होने के बाद ही क्यूँ..हर कोई रवैया बदलता है..

कोई और अपना न बन जाए

कि..मुँह उठा के चलने से डर लगता है।।

यार ये..ख़ुशियों के बड़े नखरे होते हैं..

ग़म को देखो हर हालात में टिका रहता है।

कोई मायूसी न पढ़ ले

कि..ज़्यादा मुस्कुराने से भी डर लगता है।

कोई और ख़्वाब न देख लूं

कि सोने से डर लगता है।।

मेरी कश्ती..

वो तूफ़ान मेरी सारी हस्ती ले गया 

मांझी के साथ मेरी कश्ती भी ले गया

किनारो से रेत और समन्दर से पानी ले गया

वो तूफान मेरी घाटी की रवानी ले गया

न हवाओं में सनसनाहट.. न लहरों में उफ़ान आया

परिन्दे घर को लौटें..न ऐसा कोई पैगाम आया

तिनको को जमा कर मकान अभी तो बनाया था

आँखों में बेबसी हाथों में रेत फ़िसलती दे गया..

मांझी के साथ मेरी कश्ती भी ले गया

वो तूफान मेरी सारी हस्ती ले गया..!

न लम्हों को संजोया..न ख्वाबों का मकान बनाया

कोई जाने को हो जैसे..न ऐसा कोई फ़रमान आया

पिछले सैलाब का पतवार बस अभी तो सुखाया था

मेरे इक पत्थर के बदले क्यूँ  सीप के मोती दे गया..

वो तूफ़ान मेरी सारी हस्ती ले गया

मांझी के साथ मेरी कश्ती भी ले गया..!!

कोई बोल दे उन्हें..

​बज़्म-ऐ-हयात * में शाम सजाकर

अपनी बेशरमियो का हम ख़ुद

मुशायरा करते हैं..

कोई बोल दे उन्हें, जो पीठ पे बोलते हैँ।


ग़मो पे तो हमने खूब वाहवाहियाँ बटोर ली

आओ गाली भी दे लो

देखो हम कैसे नज़्म में बदलते हैं..।।


 किताबों से हर्फ़ उधार लेकर

हम दिल-ऐ-उल्फ़त का खर्चा उठाते हैं..

कोई बोल दे उन्हें, जो हमे अमीर समझते हैँ।


आँखे को सुखा हमने क़लम गीली कर ली

आज़ आप इतना सा बोलो 

देखो ..फिर हम ख़ुद कितना बनाते हैं..।।


बज़्म-ऐ-हयात: महफिल-ऐ-ज़िन्दगी।

जहमत उठाए कौन..

​गफलत भरी ज़िन्दगी है..और तजुर्बे उठाए कौन

रास्ता लम्बा..हर मोड़ साथ निभाए कौन

हमने सोंचा मिलोगे तो कर लेंगे गुफ़्तगू

आँख अभी सूखी हैं भिगाए कौन


तमाशा होगा तो यहां महफ़िल भी होगी

कुछ बाते खुलेंगी तो बातें भी बनेंगी

बेतरतीब सवालों को सुलझाए कौन

दिल जानता है जवाब जिनके उन सवालों को दोहराए कौन


कौन भटके यूँ काफिर बने

बेहतर है अपनी मंजिल का मुसाफ़िर बने

पत्थर हुआ है दिल..बेकार सहलाए कौन

कौन झगड़े मुक़द्दर से..इतनी जहमत उठाए कौन।।

याद है..

तिशनगी में तेरे ख्यालो की डूब जाना

और बेवक़्त बेवज़ह मुस्कुराना..

मुझे याद है..तेरा बिन दस्तक आना 

और बेखबर यूँ चले जाना..

तेरी बेरुखी से अक़्सर बिखर जाना

 
और नर्म लफ़्जों से तेरा सहलाना

मुझे याद है तेरे

लफ्ज़ो का होठों तक आना

और आँखों से सब बता जाना..

जुबां की ज़रा सी हरकत पे 

तेरी आंखो का सहम जाना

मुझे याद है..

मेरे चेहरे का जरा मुरझाना और

तेरी पलकों का नम हो जाना.

जब हाथ अपने मेरे हाथों से जोड़ते थे तुम


इश्क़ लकीरों का खेल नहीँ

ख़िताब नसीब का है बोलते थे तुम

मुझे याद है..

तक़दीर को कोस कर 

वादों से तेरा मुकर जाना..

तेरी आहट से सांसो का खिलखिलाना

और..तुम कब आए का यूँ ही बहाना..

मुझे याद है..

तेरा बेसबर मेरी राह तकना

और अचानक पलट के फिर न देखना..

यादो की कफ़स में अँधेरा घना है

लिफाफे में जरा सी रौशनी भेज दे..

अल्फाजों से लम्हे चुराकर 

खतो को खूब खंगाला.. 

मुझे याद नही तारीख..

कब है तेरा वापस आना….?

क्या लिख दूँ..?

क़लम बोलती है के लिख दूँ

तेरा बेपरवाह रवैया..

दिल कहता है..वो तेरी नादानियाँ लिख दूँ

कलम कहती है लिख दूँ..तेरी बातें झूठी

दिल को अब भी उन बातों से गुदगुदी लगती है

क़लम बोलती है..लिख़ने को 

वो झगड़े जब आँखे रोई थी

दिल इशारा करता है..लिखने को

हाथो का तेरे इन गालों से छु के गुज़रना

क़लम तो कहती है कि लिख दूँ 

हर वो पल जो तेरे इंतज़ार में अकेला था

दिल का इशारा है कि

तेरे इंतजार की वो बेसब्री..लिखूँ

क़लम कहती है..लिख दूँ वो पल 

जिनमे रूठी रही तुमसे

और दिल कहता है..कि नहीँ मेरे रुठने के बाद 

तेरा मनाना लिखू

क़लम बोलती है लिख दूँ वो पल 

जब तुमने मेरी वो इक बात नहीँ मानी थी

दिल तेरी वक़ालत में बोलता है..

नख़रे भी तेरे हज़ार थे..

क़लम बोलती है लिख दे 

जब उसके साथ होते हुए भी तू अकेली थी

दिल कैसे भूल जाए..खोई ज़िन्दगी का

 ढूंढ के लाना तेरा

क़लम कहती है लिख दूँ..वो झील और बाग़बाँ में 

न जाना तेरा..

और याद करता है दिल फिर

लड़खड़ाते रस्ते पे हाथ थामना तेरा

तुम ही बता दो क्या लिख दूँ..

तेरा यूँ ही बीच मोड़ पे छोड़ के जाना 

क्या लिख़ दूँ..इक मुसाफ़िर सा तुमको भी..

तू ही बता ये राते.. ये करवट.. तेरी यादें..

 या ये ख़्वाब लिख दूँ

या टूटते तारे की इक दुआ तेरे नाम लिख दूँ..

चलो इक खूबसूरत अंजाम लिख दूँ..

इंतजार ही तेरे नाम लिख दूँ…

यूँ ही..

अपना कह के

 न अपनाने वालों से 

अफ़जल* है ये..

दुनिया हमारी

जिसे हम आइना कहते हैं…

संवर जाए रूह..तो क्या बात है

हम कमियों को अपनी 

ख़ुद गिना करते हैं..

हर्फ़* तेरे बर्दाश्त हैं..

पर ये लहज़ा नहीँ 

हम समन्दर भले न सही..जहनसीब

पर पानी तो हम भी रखते हैं..


अफ़जल: बेहतर ।

हर्फ़: अक्षर ।

तय कीजिए..!

सुनिये ज़नाब..

बड़ी जल्दी में रहते हो

कुछ खोया सा लगता है..

कुछ ढूढा करते हो…

मानो कोई मुन्तज़िर छोड़ गये थे

तो..अज़ीब मज़ाक है..

भला कौन रुकता है ऐसे..

मुसाफ़िर बसते हैं यहाँ

सफ़र लम्बा हो तो साथ चलते हैं

साथ चलना है..तो बस गुफ़्तगू करते हैं

बदलते रस्तों के साथ सब यूँ बदलते हैं..

सुनिए ज़नाब..

बड़ी ख्वाबीदा दुनिया है..

खोया जो उसे ख़्वाब समझिये

खोजते में उसे..कहीँ

खुद को न खो दीजिये

रास्ता लम्बा है..जाइये

तय कीजिये..!!

Blog at WordPress.com.

Up ↑